Hindustani Music Terms and Definitions-Part 1

राग या शास्त्रीय संगीत के पारिभाषिक शब्द - भाग १ राग गायन एवं वादन मे राग के कुछ लक्षण एवं नियम होते हैं। जिनमे वादी, संवादी, अनुवादी एवं विवादी का विशेष स्थान है। इनकी परिभाषाएँ नीचे दी गयी हैं।

शास्त्रीय संगीत के पारिभाषिक शब्द  - भाग १

राग गायन एवं वादन मे राग के कुछ लक्षण एवं नियम होते हैं। जिनमे वादी, संवादी, अनुवादी एवं विवादी का विशेष स्थान है। इनकी परिभाषाएँ नीचे दी गयी हैं।

 

वादी:

किसी राग मे वादी स्वर उसे कहा जाता है जिस पर उस राग मे सबसे अधिक न्यास या ठहराव किया जाता है। इस स्वर पर उस राग सबसे अधिक ज़ोर रहता है। इसीलिए इस स्वर का प्रयोग बार बार होता है। इसे राग मे राजा की उपाधि दी गय़ी है। एेसा देखा गया है कि उस राग के बन्दिशों का सम भी अधिकांश वादी स्वर पर ही होता है। उदाहरण: राग काफ़ी का वादी स्वर 'प' यानि पंचम अौर राग यमन का वादी स्वर 'ग' यानि गंधार है।

संवादी:

संवादी स्वर राग मे वादी स्वर का सहायक होता है। राग मे इसका महत्व वादी स्वर से कम परन्तु अन्य स्वरों से अधिक होता है। अत: राग मे इसका स्थान मंत्री जैसा समझना चाहिए। ये सदैव वादी स्वर से चौथा या पँाचवा स्वर होता है। उदाहरण: राग काफ़ी मे संवादी 'सा' है जो उसके वादी 'प' से चौथा स्वर बैठता है।

अनुवादी:

वादी एवं संवादी के अलावा राग के बाकी सभी स्वरों को अनुवादी स्वर कहते है। राग गायन मे इन स्वरो का अनुपात वादी एवं संवादी से कम रखना होता है। शास्त्र मे इन स्वरों का स्थान सेवक की तरह देखा गया है।

विवादी:

किसी किसी राग मे वादी, संवादी एवं अनुवादी के अलावा भी एक विशेष प्रकार के स्वर का समावेश कई बार हो जाता है जिसके कुशलतापूर्वक प्रयोग से उसकी सुन्दरता बढ़ जाती है। एेसे स्वरों को हम विवादी स्वर कहते हैं। विवादी स्वर वैसे तो उस राग के अारोह -अवरोह मे नही होते परन्तु बन्दिश या अालाप मे सुन्दरता बढ़ाने हेतु शामिल कर लिये जाते हैँ। प्रत्येक राग मे वादी, संवादी अौर अनुवादी स्वरों का होना अावश्यक है परन्तु विवादी स्वर सभी रागों मे नही होते। उदाहरण: राग काफ़ी मे शुद्ध 'ग' एवं अन्तरे मे शुद्ध 'नि' का प्रयोग अौर राग देश मे कोमल 'ग'(तार सप्तक मे) विवादी स्वरों के अच्छे उदाहरण हैं।

अालाप:

राग गायन या वादन मे धीमी गति से स्वरों या बोलो की एेसी प्रस्तुति जो निबद्ध यानि ताल मे बंधी हुई ना हो तो उसे हम रागालाप या अालाप कहते हैं। अालाप करने की अनेक शैलियां है। जैसे खयाल गायन मे अाकार, बोल या सरगम द्वारा अालाप करने की प्रथा है। ध्रुपद गायन मे नोम-तोम से अालाप किया जाता है। अच्छे अालाप गायन के लिए राग एवं स्वर का उचित ज्ञान अावश्यक है।

अागे अगले अंक मे....